बुधवार, 27 जून 2012

जितने कंकर उतने शंकर (???!!!) जितने मज़ार उतने परवरदिगार (???!!!)

जितने कंकर उतने शंकर (???!!!) जितने मज़ार उतने परवरदिगार (???!!!)


जबकि धर्म ग्रन्‍य कहते हैं-....


जितने कंकर उतने शंकर (???!!!

“एकम् ब्रह्म द्वितीय नास्ति नास्ति किंचन नास्ति”
^^न तस्‍य प्रतिमा अस्ति^^
"Na tasya pratima asti"

"There is no image of Him."[Yajurveda 32:3] [Svetasvatara Upanishad 4:19]

"Ekam evadvitiyam"
"He is One only without a second." [Chandogya Upanishad 6:2]

"Na casya kascij janita na cadhipah."
"Of Him there are neither parents nor lord." [Svetasvatara Upanishad 6:9]

"Na tasya pratima asti"
"There is no likeness of Him." [Svetasvatara Upanishad 4:19]

"shudhama poapvidham"
"He is bodiless and pure." [Yajurveda 40:8]

"Na samdrse tisthati rupam asya, na caksusa pasyati kas canainam."
"His form is not to be seen; no one sees Him with the eye." [Svetasvatara Upanishad 4:20]



"Andhatama pravishanti ye asambhuti mupaste". [Yajurved 40:9]

Translation 1.
They enter darkness, those who worship natural things (for example air, water, sun, moon, animals, fire, stone, etc).
They sink deeper in darkness those who worship sambhuti. (Sambhuti means created things, for example table, chair, idol etc.)
[Yajurved 40:9]

Translation 2.
"Deep into shade of blinding gloom fall asambhuti's worshippers. They sink to darkness deeper yet who on sambhuti are intent."
[Yajurveda Samhita by Ralph T. H. Giffith pg 538]

Translation 3.
"They are enveloped in darkness, in other words, are steeped in ignorance and sunk in the greatest depths of misery who worship the uncreated, eternal prakrti -- the material cause of the world -- in place of the All-pervading God, But those who worship visible things born of the prakrti, such as the earth, trees, bodies (human and the like) in place of God are enveloped in still greater darkness, in other words, they are extremely foolish, fall into an awful hell of pain and sorrow, and suffer terribly for a long time."
[Yajur Veda 40:9.]

"Na tasya pratima asti"
"There is no image of Him."[Yajurveda 32:3]

"Ekam evadvitiyam"
"He is One only without a second." [Chandogya Upanishad 6:2]

"Na casya kascij janita na cadhipah."
"Of Him there are neither parents nor lord." [Svetasvatara Upanishad 6:9]

"Na tasya pratima asti"
"There is no likeness of Him." [Svetasvatara Upanishad 4:19]

"shudhama poapvidham"
"He is bodiless and pure." [Yajurveda 40:8]

"Na samdrse tisthati rupam asya, na caksusa pasyati kas canainam."
"His form is not to be seen; no one sees Him with the eye." [Svetasvatara Upanishad 4:20]


जितने मज़ार उतने परवरदिगार (???
!!!)

“In the name of Allah, the Beneficent, the Merciful
Say: He is Allah the One and Only; (1) Allah, the Eternal, Absolute; (2) He begetteth not, nor is He begotten; (3) And there is none like unto Him. (4)”
Quran 112 :1-4


“तुम्‍हारे रब का हुकुम है कि उसके अलावा किसी की इबादत न करो. (कुरआन- 15/23)”
“और अल्‍लाह के अलावा जिनको पुकारते हो बेशक वह भी तुम्‍हारी ही तरह के बन्‍दे हैं.” (कुरआन- 8/194)

“और उससे बढ़कर गुमराह (रास्‍ता भटका हुआ) कौन होगा जो अल्‍लाह के सिवा ऐसों को पुकारता है जो क़यामत तक उसकी दुआ क़बूल न कर सकेंगे बल्कि उनके पुकारने से बिल्‍कुल बेख़बर हैं. (कुरआन- 26/5)

रसूल (सल्‍लल्‍लाहो अलैहि वसल्‍लम) ने एक जनाज़े पर फ़रमाया -‘’तुम में कोई ऐसा है जो मदीना जाय और तमाम बुतों को तोड़ डाले, तमाम तस्‍वीरों को मिटादे और तमाम ऊंची क़ब्रों को गिराकर बराबर करदे, एक शख्‍स कहता है ‘’मैं जाता हूं या रसूलुल्‍लाह! (सल्‍लल्‍लाहो अलैहि वसल्‍लम). चुनांचे वह जाता है और वापिस आकर कहता कि या रसूलुल्‍लाह! (सल्‍लल्‍लाहो अलैहि वसल्‍लम) मैंने किसी क़ब्र को बगै़र बराबर किये नहीं छोड़ा और किसी तस्‍वीर को मिटाए बगै़र नहीं छोड़ा. फिर नबी करीम (सल्‍लल्‍लाहो अलैहि वसल्‍लम) ने फरमाया ‘’अब जो शख्‍स इन कामों में से किसी काम को करेगा तो वह उस किताब के साथ कुफ्र करेगा जो मुहम्‍मद पर अल्‍लाह ने नाजि़ल (अवतरित) की है. (हदीस शरीफ़-मुस्‍नद अहमद)

विशुद्ध एकेश्वरवाद के तर्क का एक उदाहरण: जब तुम अपने दासों (नौकरों, सेवकों आदि) को अपने स्वामीत्व में, अपने माल-दौलत में, अपने अधिकारों में शरीक होना पसन्द और बर्दाश्त नहीं करते तो फिर ईश्वर के प्रभुत्व, स्वामित्व व अधिकारों में दूसरों को साझी व समकक्ष क्यों बनाते हो? (कुरआन भावार्थ, 30:28)

बुधवार, 6 जून 2012

‘’गौतम-उमर हुए’’ हिन्‍दी अखबार ‘’अमर उजाला’’ (बरेली)


अल्‍लाह ने मेरे लिये अपना रास्‍ता आसान कर दिया




---मुहम्‍मद उमर गौतम/ श्‍याम प्रताप सिंह (फतेहपुर, उत्‍तर प्रदेश)



जब मैंने सच्‍ची नीयत के साथ कुरआन का तर्जुमा पढ़ा तो ज़हन में कुलबुलाने वाले तमाम सवालों के जवाबात खुद बखुद मिलते चले गये और अल्‍लाह ने अपना वादा सच कर दिया कि जो लोग हिदायत के तलबगार होंगे उन्‍हें हिदायत जरूर मिलेगी.
इस्‍लाम कुबूल करने के बाद सबसे पहले यूनिवर्सिटी में पढ़ने वाले साथियों ने मुख़ालिफ़त (विरोध) की. अक्‍सर दोस्‍त यह सवाल करते थे कि आखिर ऐसी कौन सी मजबूरी आ गयी जिसकी वजह से तुमको इस्‍लाम धर्म अपनाना पड़ा. क्‍या और कोई धर्म नहीं था?
इस्‍लाम कुबूल करने के बाद सबसे पहले यूनिवर्सिटी में पढ़ने वाले साथियों ने मुख़ालिफ़त (विरोध) की. अक्‍सर दोस्‍त यह सवाल करते थे कि आखिर ऐसी कौन सी मजबूरी आ गयी जिसकी वजह से तुमको इस्‍लाम धर्म अपनाना पड़ा. क्‍या और कोई धर्म नहीं था?  इन बेचारों को मालूम ही नहीं था कि इस्‍लाम की तालीमात (शिक्षाएं) क्‍या हैं और इस्‍लाम की बुनियाद किन चीज़ों पर है?  कुछ मुददत के बाद कालेज की वाल मैग्‍जीन में मेरा इण्‍टरव्‍यू इस्‍लाम कुबूल करने के ताल्‍लुक से चस्‍पा कर दिया गया. जिसे कई हज़ार स्‍टूडेन्‍ट्स ने पढ़ा और पूरी यूनिवर्सिटी के लोग चेमीगोइयां करने लगे. यहां तक बरेली से निकलने वाले एक हिन्‍दी अखबार ‘’अमर उजाला’’ में ‘’गौतम-उमर हुए’’ हैडिंग बनाकर खबर छाप दी गयी.





     मेरी पैदाइश 1964 ई0 में यूपी स्‍टेट के फतेहपुर जिला के एक राजपूत खानदान में हुई. यह खानदान गौतम के नाम से जाना जाता है. वालिद साहब का नाम जनाब धनराज सिंह गौतम है. जो एक रिटायर्ड सरकारी आफीसर हैं. कई सौ बीघे खेती के मालिक हैं. अल्‍लाह ने दुनियावी एतबार से बहुत नवाजा है. मेरी इब्तिदाई तालीम हाईस्‍कूल तक गांव में ही हुई. और पन्‍द्रह साल की उम्र में इलाहाबाद में आला तालीम की शुरूआत हुई. बारहवीं जमात के बाद नैनीताल जिले की पनक नगर एग्रीकल्‍चरल यूनिवर्सिटी में बीएससी एग्रीकल्‍चरल डिग्री के लिए 1980 में दाखिला लिया. और इसी यूनिवर्सिटी में 1984 ई0 में अल्‍लाह ने हिदायत का मामला किया. और मैंने इस्‍लाम कुबूल करके अपना नाम श्‍याम प्रताप गौतम से बदल करके मुहम्‍मद उमर गौतम रखा.

     पन्‍द्रह साल की उम्र में मेरे जहन में इस सवाल ने सर उठाया कि हमारे घर और खानदान में जो पूजा पाठ हो रही है. वह कहां तक सही है? हमें पन्‍द्रह साल की उम्र तक यह नहीं बताया गया था कि हम हिन्‍दू हैं तो क्‍यों हैं? और हमारा ईमान और यकीन क्‍या है? मैंने जब गौर व फिक्र किया तो ढेर सारे सवालात जहन में पैदा हो गये. मिसाल के तौर हमारा पैदा करने वाला कौन है? हमारी जिन्‍दगी का मक़सद क्‍या है? मरने के बाद हम कहां पहुंचेंगे? किसकी पूजा की जाये और किसकी न की जाये?  33 करोड़ देवी देवताओं की पूजा पाठ कैसे की जाये. 86 लाख योनियों में आवागमन कैसे मुम्किन है. कहीं मां बाप ही पैदा करने वाले तो नहीं हैं? समाज में अपने ही जैसे लोगों को अछूत क्‍यों बना दिया गया है? बगैरह बगैरह.

     इन सब सवालों का जवाब पाने के लिए मैने सबसे पहले अपने घर वालों से ही इन्‍क्‍वारी शूरू की . उनके पास कभी भी कोई सही जवाब न था. बेचारे जवाब कहां से देते. उन्‍होंने मुझे समझाने की कोशिश की कि बेटा जो तुम्‍हारे बाप दादा का धर्म है वहीं तुम्‍हारा धर्म है. उसी पर तुम्‍हें चलना है और जो खानदानी रस्‍म व रवाज धर्म के नाम पर चले आ रहे हैं उन्‍हें ही अपनाना है. तुम्‍हारी जिन्‍दगी का मकसद एक कामयाब इन्‍सान बनना है. मां बाप की खिदमत करनी है और गलत कामों से बचना है. लेकिन कभी भी ये बात सामने नहीं आई कि हिन्‍दू धर्म की जो सबसे पुरानी धार्मिक किताबें हैं जिन्‍हें वेदों के नाम से जाना जाता है. उनकी बुनियादी तालीम यह है कि ‘’एकम् ब्रह्रम द्वितीय नास्ति नास्ति नास्ति किंचन नास्ति’’ यानी ब्रहमा एक है दूसरा नहीं है, नहीं है, बिल्‍कुल भी नहीं है.’’ इसका मतलब सिर्फ और सिर्फ एक ही ईश्‍वर की उपासना होनी चाहिए. किसी दूसरे की नहीं. वेदों में बुतपरस्‍ती के खिलाफ़ आवाज़ उठाई गयी है (न तस्‍य प्रतिमा अस्ति) और लोगों को बताया गया है कि इन्‍सान अगर कामयाबी चाहता है तो सिर्फ और सिर्फ एक ईश्‍वर की इबादत करे. मुझे जब अपने घर वालों से अपने बड़ों से और उन तमाम पण्डितों से जो हमारे यहां पूजा पाठ कराने आते थे सही जवाब नहीं मिला तो मैंने धार्मिक किताबों का मुताला (अध्‍ययन) शुरू कर दिया.



     सबसे पहले हिन्‍दू धर्म की किताबें पढ़ने को मिलीं और खासतौर पर गीता प्रेस गोरखपुर की काफी किताबें मुताले (अध्‍ययन) में आयीं. गीता, रामचरितमानस, महाभारत, वेद, पुराण और मनुस्‍मृति से मुताल्लिक काफी किताबें पढ़ने और समझने की कोशिश की. पन्‍तनगर यूनिवर्सिटी, उत्‍तराखण्‍ड में तालीम के दौरान तकरीबन तीन साल यूनिवर्सिटी की लाइब्रेरी में काफी किताबें पढ़ने को मिली. खासतौर पर गौतमबुद्ध, विवेकानन्‍द, परमहंस रामकृष्‍ण, गांधी, नेहरू और मुख्‍तलिफ़ सोशल रिफार्मर की जिन्‍दगियां (जीवनी) पढ़ने का शौक़ पैदा हुआ. मैं इस कोशिश में था कि इन लोगों की कामयाबी के राज का पता चले. बहुत ज्‍यादा पढ़ने की वजह से हजारों सवालात जहन में कुलबुलाने लगे और मैं काफी कन्‍फयूज़ होने लगा कि आखिर सच्‍चाई का पता क्‍यों नहीं चल रहा है. मैंने यहां तक जहन बना लिया कि अपनी डिग्री मुकम्‍मल (पूर्ण) करने के बाद अपने वालिद साहब (पिताजी) को खत लिखूंगा और उनका शुक्रिया अदा करूंगा कि उन्‍होंने पूरा खर्चा बरदाश्‍त किया लेकिन मैं हक़ की तलाश (सत्‍य की खोज)की वजह से उनके अरमानों और ख्‍वाबों को पूरा न कर सका. जिसकी मैं माफी भी मागूंगा. और पहाड़ों में जाकर सन्‍यास की जिन्‍दगी गुजारूंगा. ध्‍यान और गौर व फिक्र के जरिये अपने ईश्‍वर को पहचानूंगा कि वह कहां है और कैसा है और हमसे क्‍या चाहता है. यह वक्‍त आता कि इससे पहले ही अल्‍लाह ने दिल में यह बात डाल दी कि तुम अपने पैदा करने वाले ही से खुद क्‍यों नहीं मांगते कि वह तुम्‍हें सीधा रास्‍ता दिखलाये और हक़ (सत्‍य) को पहचानने और उस पर चलने में मदद करे. इसी वजह से मैंने रातों को अल्‍लाह से मांगना शुरू किया और देखते ही देखते अल्‍लाह ने मेरे लिये अपना रास्‍ता आसान कर दिया.

     1984 ई0 में हमारे एक दोस्‍त नासिर खान जो जिला बिजनौर के रहने ववाले हैं वह मेरे क्‍लास फेलो थे. उन्‍हें अल्‍लाह ने मेरी हिदायत का ज़रिया बना दिय. स्‍कूटर से मेरा एक्‍सीडेंट हो गया था और पैर में काफी गहरी चोट आ गयी थी. जिसकी बिना पर (जिसके कारण) हास्पिटल जाने की नौबत आ गयी. साइकिल चलाना छूट गया और काफी परेशानी का सामना करना पड़ा. इस दौरान नासिर खान साहब ने मेरी टूट कर मदद की. मुझे अपने साथ हास्पिटल ले जाते थे. कालेज ले जाते थे. और मेस से खाना लाकर रूम में मेरे साथ बैठ कर खाते थे. करीब करीब एक महीना तक यह सिलसिला चलता रहा और मैं उनसे काफी मुतास्सिर (प्रभावित) हुआ. एक दिन मैंने उन्‍हें बिठा कर सवाल किया कि आप मेरे साथ इतनी मुहब्‍बत व हमदर्दी का मामला क्‍यों करते हैं और यह इन्‍सानियत और यह अख़लाक़ आपने कहां से सीखे हैं?  उन्‍होंने जवाब दिया कि ‘’ गौतम साहब मैं यह काम किसी लालच में या दबाव में नहीं कर रहा हूं. यह बात आप अपने ज़हन से बिल्‍कुल निकाल दें. बल्कि मैं एक मुसलमान हूं और इस्‍लाम की तालीम यह है कि पड़ोसी पड़ोसी है. चाहे वह कोई भी हो. पड़ोसी के साथ अच्‍छा बर्ताव करना उसकी मदद करना मुसीबत में उसके काम आना, किसी भी मुसलमान की बुनियादी जिम्‍मेदारी है. और मुझे इस बात का डर है कि अगर मैंने इस हाल में आपकी मदद नहीं की, आपके काम नहीं आया तो मैं आने पैदा करने वाले को क्‍या मुंह दिखाउूंगा, मुझसे इस बारे में सवाल किया जायेगा कि मैंने मुसीबत के वक्‍त आपके साथ कैसा सुलूक किया.’’ मैं उनके जवाब से बहुत ज्‍यादा मुतास्सिर (प्रभावित) हुआ और मुझे इस्‍लाम का पहला सबक पड़ोसी के बारे में मिला. और हिसाब किताब के दिन यानी हश्र के मैदान की इत्तिला(खबर) मिली कि ऐसा भी होने वाला है. जब नासिर खान साहब के जरिये इस्‍लामी किताबों का मुताला शुरू हुआ. यह सिलसिला तकरीबन छः महीने तक चला रहा. इस दौरान मैंने चालीस पचास किताबें मुख्‍तलिफ़ उन्‍वानात (विभिन्‍न विषयों) की पढ़ डालीं. इन किताबों के पढ़ने से इस्‍लाम की पूरी तस्‍वीर मेरे सामने आ गयी. कुरआन करीम के हिन्‍दी तर्जुमे(अनुवाद) के साथ-साथ अल्‍लाह के रसूल हजरत मुहम्‍मद (सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम) की जिन्‍दगी और उनके मुकददस सहाबा की जिन्‍दगी भी मैंने पढ़ी. खासतौर पर कुरआन की रोशनी में तौहीद (एकेश्‍वरवाद), रिसालत और आखिरत के बारे में ज्‍यादा से ज्‍यादा मालूमात हासिल की. नासिर खान साहब ने मुझे कुरआन के पढ़ने से पहले यह एहसास दिला दिया था कि कुरआन एक आसमानी किताब और हिदायत (ईश्‍वरीय मार्गदर्शन) की किताब है. यानी दुनिया के सारे इन्‍सानों को सीधी राह बताती है. इसी बुनियाद पर जब मैंने सच्‍ची नीयत के साथ कुरआन का तर्जुमा पढ़ा तो ज़हन में कुलबुलाने वाले तमाम सवालों के जवाबात खुद बखुद मिलते चले गये और अल्‍लाह ने अपना वादा सच कर दिया कि जो लोग हिदायत के तलबगार होंगे उन्‍हें हिदायत जरूर मिलेगी. अल्‍लाह का बड़ा अहसान है कि उसने इतनी बड़ी नेमत बगैर किसी बड़ी मेहनत और कुरबानी के इनायत फरमा दी.

     इस्‍लाम कुबूल करने के बाद सबसे पहले यूनिवर्सिटी में पढ़ने वाले साथियों ने मुख़ालिफ़त (विरोध) की. अक्‍सर दोस्‍त यह सवाल करते थे कि आखिर ऐसी कौन सी मजबूरी आ गयी जिसकी वजह से तुमको इस्‍लाम धर्म अपनाना पड़ा. क्‍या और कोई धर्म नहीं था?  इन बेचारों को मालूम ही नहीं था कि इस्‍लाम की तालीमात (शिक्षाएं) क्‍या हैं और इस्‍लाम की बुनियाद किन चीज़ों पर है?  कुछ मुददत के बाद कालेज की वाल मैग्‍जीन में मेरा इण्‍टरव्‍यू इस्‍लाम कुबूल करने के ताल्‍लुक से चस्‍पा कर दिया गया. जिसे कई हज़ार स्‍टूडेन्‍ट्स ने पढ़ा और पूरी यूनिवर्सिटी के लोग चेमीगोइयां करने लगे. यहां तक बरेली से निकलने वाले एक हिन्‍दी अखबार ‘’अमर उजाला’’ में ‘’गौतम-उमर हुए’’ हैडिंग बनाकर खबर छाप दी गयी. पूरे इलाके में जंगल की आग की तरह खबर फैल गयी और बहुत सारे लोग यहां तक कि पुलिस और सीआईडी भी इंक्‍वारी में लग यगी. इस सिलसिले में तफसीली मालूमात के लिए जो भी आता था मैं उसे अपने हिसाब से जवाब देता था. विश्‍व हिन्‍दू परिषद के लोगों को यह बात बहुत नागवार गुजरी और उन्‍होंने मुझे हास्‍टल से उठा कर जंगल में ले जाकर मारपीट की और धमकी दी कि अगर तीन दिन के अन्‍दर वापस हिन्‍दू धर्म नहीं अपनाते हो तो हम तुम्‍हारी बोटी-बोटी कर डालेंगे. हालात यहां तक बिगड़े कि मुझे अपनी एमएससी एग्रीकल्चरल की डिग्री छोड़ कर यूनिवर्सिटी से बाहर जाना पड़ा और मैंने देहली का रूख किया. दो-तीन साल यूंही गुजर गये. 1988 ई0 में जामिया मिल्लिया इस्‍लामिया में एम0ए0 इस्‍लामिक स्‍टडीज में दाखिला लिया और एग्रीकल्‍चरल की लाइन छोड़ दी. घर वालों की ओर से मुखलिफ़त हुई और उन्‍होंने फैमिली बायकाट कर दिया. जिसकी बिना पर तमाम रिश्‍तेदार और ख़ानदान वालों से कई साल तक कट कर रहना पड़ा. यहां तक दस बार साल इसी हाल में बीत गये. उसके बाद हालात नार्मल हुए और आना जाना शुरू हुआ.

     जहां तक दावती काम का ताल्‍लुक़ है. अल्‍लाह का करम है कि सबसे पहले मेरी बीवी ने फिर मेरी वालिदा मोहतरमा ने इस्‍लाम कुबूल किया और आज की तारीख में तमाम रिश्‍तेदार और ख़ानदान के लोग दावती निस्‍बत से बराबर राबते(सम्‍पर्क)  में हैं और अकसरियत ऐसी है जो इस्‍लाम के बारे में सही मालूमात हासिल करना चाहती है. अफसोस तब होता है जब एक तरफ उनके सामने इस्‍लाम की सच्‍चाई और उसकी अच्‍छी तालीमात (शिक्षाएं) आती हैं तो दूसरी ओर बिगड़े हुए मुसलमानों के हालात. बहरलाल तकरीबन सौ लोगों को इस्लाम में दाखिल करने में कामयाब हो चुका हूं.

      हज़ारों गैर-मुस्लिम भाइयों से मिलकर यह महसूस हुआ कि इस्‍लाम की दावत सही माने (अर्थ) में उन तक पहंचाई नहीं गयी. जिसकी वजह से एक गलतफहमी का शिकार हैं. जबकि हकीक़त यह है कि इस्‍लाम तमाम इन्‍सानों के लिए है. बुनियादी तौर पर इस्‍लाम ने इन्‍सानियत की तालीम दी है. अगर कोई बाकायदा इस्‍लाम में दाखिल न हो तब भी वह इस्‍लामी तालीम से फायदा उठा सकता है. और आज दुनिया की बहुत सारी कौमें इस्‍लाम की तालीम से फायदा उठा रही हैं और मुसलमान दूर खड़े होकर उन्‍हें देख रहे हैं और उनकी तारीफ कर रहे हैं. अल्‍लाह से दुआ है कि हमारा समजा इस्‍लाम समाज बना दे ताकि हमें दूसरों की नकल करने की जरूरत पेश न आये. आज भी अगर तमाम मुसलमान इस्‍लाम पर चलें और इन्‍सानियत की खिदमत को अपना मक़सद बनायें तो हज़ारों लाखों लोग इस्‍लाम को समझने और अपनाने में कामयाब हो सकते हैं. यह बात भी दुनिया के सामने आनी चाहिए कि इस्‍लाम किसी को जबरदस्‍ती मुसलमान नहीं बना सकता है बल्कि यह फैसला बन्‍दे और अल्‍लाह के बीच में होता है जब तक कोई शख्‍स दिल की गहराइयों से इस्‍लाम को नहीं पहचानेगा और आखिरत की कामयाबी को निगाह के सामने नहीं रखेगा इस्‍लाम में दाखिल नहीं हो सकता और अगर आंख बन्‍द करके इस्‍लाम में दाखिल हो भी जाये तो हालात का मुकाबला करना उसके लिये मुम्किन न होगा.

      आखिर में गैर-मुस्लिम भाइयों को दिल की गहराइयों से यह बात कहता हॅूं की वह इस्‍लाम को कुरआन और हदीस की रोशनी में पढ़ने और समझने की कोशिश करें आम मुसलमानों को देखकर नहीं. और इस्‍लाम के बारे में कोई भी राय कायम करने से पहले जरूरी है कि उसकी खूब अच्‍छी तरह तहकीक़ (जांच पड़ताल) कर लें. अपने मुसलमान भाइयों से भी दरख्‍वास्‍त करता हूं कि वह गैर मुस्लिम भाइयों के साथ अपने अखलाक़ (सदाचार) व किरदार को मैयारी बनाये कि वह उनसे फायदा उठा सकें, ऐसा न हो कि आपकी बदअमली की वजह से वह आपसे नफरत करें और साथ ही इस्‍लाम से भी नफरत करने लगें और इस तरह भलाई और सच्‍चाई से महरूम (वंचित) रह जायें, मेरी नज़र में इससे बड़ी और कोई ट्रेज्‍डी नहीं सकती.


स्रोत- ‘’नवाए हादी’’ (कानपुर) एडीटर- मुहम्‍मद अख़लाक़ नदवी, मो0नं0 9889352278



Related links :

1-    वे क्‍या कहते हैं- इस्‍लाम के बारे में (What they say about Islam) http://anwar-ansari.blogspot.in/2011/11/what-they-say-about-islam.html       

2-  हिन्‍दू कवयित्री लता हया हया द्वारा मुशायरों में पेश की गई अपनी लोकप्रिय कविता http://www.youtube.com/watch?v=_XHkoisG6gM  वह है सच्‍चा मजहब जो इस्‍लाम कहाता है.

3-   मुसलमान लोग यह गुमान क्यों करते हैं कि उन्हीं का धर्म सच्चा है? http://anwar-ansari.blogspot.in/2011/10/blog-post_29.html   

4-   A hindu Speaks Out During Dr. Zakir Naik's Peace Conference 2010.. http://www.youtube.com/watch?v=bIbOvi-m_-M
इत्‍यादि अनेक लिंक सर्च करें convert hindu or convert muslim