रविवार, 20 नवंबर 2011

मुसलिम होने का मतलब


 अल्लाह के नाम से हम उसी की तारीफ़ करते हैं, उसी से मदद तलब करते हैं और माफ़ी के तलबगार हैं। अल्लाह जिसे सही मार्गदर्शन (सीधा रास्ता) करना चाहे उसे कोई भटका नहीं सकता और जिसे अल्लाह रास्ते से भटकाना चाहे उसे कोई सही राह पर नहीं ला सकता। हम गवाही देते हैं कि कोई माबूद (पूजा के लायक) नहीं है सिवाए अल्लाह के और गवाही देते हैं कि मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम अल्लाह के बन्दे और अन्तिम रसूल हैं।
 सबसे पहले मुसलिम शब्द का मतलब मालूम करते हैं । मुसलिम शब्द जिसका हम आमतौर पर इस्तेमाल करते हैं, का असल मतलब क्या है? मुसलिम वह है जो अपनी इच्छा, मर्जी अल्लाह की मर्जी, ख्वाहिश के आगे त्याग दे। दूसरे शब्दों में अपने आपको अल्लाह के लिए समर्पित कर देना । अब सवाल है कि कौन मुसलिम है और कौन मोमिन? क्या कोई आदमी अपने जन्म के आधार (गुण) पर मुसलिम हो सकता है? क्या आदमी मुसलिम सिर्फ इसी वजह से हो सकता है कि वह किसी मुसलिम का बेटा या बेटे का बेटा (पौ़त्र) है? क्या कोई महज मुसलिम घर में पैदा होने मात्र से मुसलिम हो जाता है? जैसे कि हिन्दू का बेटा हिन्दू होता है या अंग्रेज का बेटा अं्रग्रेज होता है । क्या मुसलिम जाति है या राष्ट्र्ीयता है। क्या मुसलिम होना मुसलिम उम्मत से संबंध रखना है । जैसे आर्यन लोग आर्यन जाति से संबंधित थे। जैसे जापानी लोग जापनी होते हैं, क्योंकि वह जापान में जन्म लेते हैं । उसी तरह से क्या मुसलमान मुसलिम कहलाता है क्योंकि उसने मुसलिम मुल्क में या मुसलिम घर में जन्म लिया है ? आपका इन सवालों से संबंधित उत्तर ‘न’ में होगा। एक मुसलिम सही मायने में मुसलिम नहीं हो सकता, महज इस वजह से कि वह मुसलिम पैदा हुआ है।  वह मुसलिम इसलिए है क्योंकि वह इस्लाम को मानता है। अगर वह इस्लाम को त्यागता है वब वह मुसलिम नहीं होता। कोई आदमी चाहे ब्राह्मण हो या राजपूत, अंग्रेज हो या जापानी, काला हो या गोरा वह शख्स इस्लाम ग्रहण करने पर मुसलिम समाज (कौ़म) का सदस्य बन जाता है। इसके विपरीत यदि कोई शख्स जो मुसलिम घर में पैदा हुआ है उसको मुसलिम उम्मत से निकाल दिया जाता है या उसने इस्लाम को अपनाने से छोड़ दिया चाहे वह नबी का उत्तराधिकारी ही क्यों न हो। वह मुसलिम नहीं हो सकता।
 यह इस बात को स्थापित करता है कि अल्लाह की सबसे बड़ी नेमत (उपहार) जिसका हम आनन्द उठाते हैं कि मुसलिम होना, यह कोई ऐसी बात नहीं कि वह अपने आप पैतृक रूप में हमें हमारे मां, बाप से मिलती है, जो जिन्दगी भर आधिकारिक रूप से हमारे नज़रिये और अख़लाक़ के बरखिलाफ़ हमारे पास रहती है। यह एक तोहफ़ा है जिसको पाने के लिए हमें लगातार लड़ना है।
 हम सब इस बात पर राजी है कि इस्लाम ग्रहण करने पर हम मुसलिम बन जाते हैं । लेकिन इस्लाम ग्रहण करने का मतलब क्या है? क्या इसके मायने यह होते हैं कि जो केाई भी यह ज़बानी इक़रार करता है कि ‘‘मैं मुसलिम हूं’’ या मैंने इस्लाम कुबूल कर लिया है? वह यह कहने से सच्चा मुसलमान बन जाता है ? या इसका मतलब यह होता है कि जैसे एक हिन्दू धर्म को मानने वाला कुछ संस्कृत के लिखे शब्दों को पढ़ ले बिना उनके मतलब को समझे। इसी तरह से कोई शख्स कुछ अरबी शब्दों को बिना उनका मतलब जाने पढ़े और मुसलमान हो जाए? आप इस सवाल का क्या जवाब देंगे। हम इसका जवाब देंगे कि इसलाम कुबूल करने का मतलब होता है कि मुसलमान पूरे होश और समझ-बूझ के साथ स्वीकार करे कि जो कुछ भी कुरआन में उतारा गया है उसके हिसाब से चलें। जो लोग इसके मुताबिक अमल नहीं करते हकी़क़त में वह मुसलिम नहीं हैं।
 इस्लाम में सबसे पहले ज्ञान (इस्लामी मालूमात) है और फिर उस ज्ञान को (व्यवहार में लाना )अमली जामा पहनाना है। कोई भी शख्स सच्चा मुसलिम नहीं हो सकता बिना इस्लाम का मतलब जाने,क्योंकि  वह मुसलमान होता है तो न कि जन्म से बल्कि ज्ञान (इस्लामी मालूमात) हासिल कर उसे अपनी जिन्दगी में व्यवहारिक रूप से उतारे। यह बात स्पष्ट है कि कोई मालूमात न होने कि वजह से सच्चा मुसलिम बनना और रहना नामुमकिन है। मुसलमान घरों में जन्म लेना, मुसलमानी नाम रखना, मुसलमानी पहनावे (कपड़े) पहनना और अपने आपको मुसलिम पुकारना ही मुसलमान होने के लिए काफ़ी नहीं है ।
 काफ़िर (नास्तिक) और मुसलिम के बीच अन्तर सिर्फ़ नाम का ही नहीं है, जैसे किसी का नाम स्मिथ या रामलाल और अब्दुल्लाह  है। कोई आदमी सिर्फ़ नाम की वजह से काफ़िर और मुसलिम नहीं होता । इसमें सबसे बड़ा अन्तर इस्लामी मालूमात का और उसपर अमल का है । एक काफ़िर यह नहीं समझता कि उसका अल्लाह से क्या संबंध है और अल्लाह का उससे क्या ताल्लुक़ है । जिस तरह से वह अल्लाह की मर्जी को नहीं जानता उसी तरह से वह सीधा रास्ता नहीं जान सकता, जिसपर चलकर वह अपनी जिन्दगी गुजा़र सके। यदि एक मुसलिम अल्लाह की मर्जी को नज़रअन्दाज़ कर दे, तब किस आधार पर काफ़िर के बजाय मुसलमान कहा जायेगा?
 यहांँ पर जजा़ (इनाम) और सजा़ में अल्लाह के नज़दीक बहुत बड़ा फ़र्क़ है, जो रस्मी तौर पर (दावा करने वाले) कथित मुसलिम और एक सच्चे मुसलमान  के बीच एक कथित तौर पर मुसलिम होने का दावा करने वाला मुसलमान कहलाया जा सकता है, जब वह मुसलिम नाम रखे और मुसलिम घर में पैदा हुआ हो। लेकिन अल्लाह के नज़दीक  सच्चा मुसलमान वही हागा, जो इस्लामी मालूमात रखता हो और कुरआन व सुन्नत के मुताबिक अमल करे। ऐसे वह लेग हैं, जिनको अल्लाह ने कुरआन के अन्दर मोमिन का खिताब दिया है और इन मोमिनों के लिए अल्लाह ने आखिरत में अच्छे इनाम का वादा किया है।
अल्लाह हमंे उन लोगों में से बनाये जो निरन्तर अपने गुनाहों की बख्शिश मांगते रहते हैं और वह अपनी असीमित रहमत और अपनी हिफ़ाजत में रखे । आमीन.

रविवार, 13 नवंबर 2011

पुनर्जन्‍म सिद्धांत


      पुनर्जन्‍म सिद्धांत सर्वमान्‍य सिद्धांत के रूप में माना जा रहा है׀ हिन्‍दुओं के ईश्‍वरीकृत वेदों में मूलतः पुनर्जन्‍म का स्‍पष्‍ट उल्‍लेख नहीं है׀ यह बाद की कल्‍पना है׀ हिन्‍दुओं के घर में हर वाद पर विवाद है׀ पुनर्जन्‍म के साथ भी विरोधावास है׀ हिन्‍दुओं के धार्मिक ग्रन्‍थों में और सामान्‍य धार्मिक विश्‍वासों में और विशेषकर गरूड़ पुराण में स्‍वर्ण-नरक को भी मान्‍यता है׀ मरने वाले के लिए अनिवार्यतः स्‍वर्गवासी शब्‍द का प्रयोग हिन्‍दुओं में किया जाता है׀ गीता में जहां मृत्‍यु को पुराने वस्‍त्र त्‍याग और उसके बाद नए वस्‍त्र के रूप में अन्‍य जीवन धारण बतलाकर अर्जन को इस शरीर की नश्‍वरता का ज्ञान कराया गया है वहीं इसी गीता में अर्जुन को प्रभावी ढंग से उदबोधन हेतु कहा गया है कि अगर मरोग तो स्‍वर्ग में जाओगे और जीतोगे तो राज्‍य भोगोगे׀ इससे यह सिद्ध हुआ कि पुनर्जन्‍म और आवागमन सिद्धांत के बावजूद हिन्‍दुओं के साथ धार्मिक और नैतिक रूप से स्‍वर्ग-नरक का विश्‍वास भी सामान्‍यतः जुड़ा़ हुआ है׀ गीता की उपरोक्‍त उक्ति से यह भी सिद्ध होता है नैतिकता के लिए प्रेरणा स्‍वर्ग-नरक के विश्‍वास से ही संभव है׀ आखिर गीता का उद्देश्‍य अर्जुन को निमित्‍त मात्र बनाकर मानव को नैतिक कार्य के लिए प्रेरित ही तो करना था और इसके लिए कृष्‍ण ने ‘स्‍वर्ग’ की उपलब्धि को ही मात्र उपाय समझा׀ इससे यह भी सिद्ध हुआ कि पुनर्जन्‍म हिन्‍दू दर्शन का एक दार्शनिक सिद्धांत भले ही हो, लेकिन धार्मिक मान्‍यता स्‍वर्ग-नरक की ही है׀ पुनर्जन्‍म का सिद्धांत तर्क शास्‍त्र के भी विपरीत है׀ कहा जाता है कि यह कलियुग है और पाप बढ़ता जा रहा है׀ सत्‍ययुग में पाप कम होते थे׀ साथ ही साथ यह भी कहा जाता है कि पुण्‍य से ही मनुष्‍य योनि प्राप्‍त होती है और पाप से पशु योनि׀ यदि ऐसा है तो आजकल जब कलियुग है और पाप चरम सीमा तक बढ़ रहे हैं, नित्‍य मनुष्‍यों की आबादी कैसे बढ़ रही है? जब पानी इसी जन्‍म में किए हुए पाप का अहसास नहीं करता तो पूर्वजन्‍म का उसे कैसे अहसास कराया जा सकता है? कदापि नहीं׀ तब इस परिस्थिति में पुनर्जन्‍म का सिद्धांत व्‍यर्थ और अनुपयोगी है׀ यह नैतिक शास्‍त्र के भी विरूद्ध है׀ मान लीजिए कि किसी का नौजवान पुत्र मर जाए और हमें वहां शोक सान्‍त्‍वना देने के लिए जाना पड़े तो क्‍या हम उस दुःखी पिता से यह कहें कि पुनर्जन्‍म में आपने किसी के पुत्र की हत्‍या की थी׀ दुःख में स्‍वयं को और दूसरों को सान्‍त्‍वना इसी कथन और विश्‍वास में निहित है कि धीरज रखिए׀

लेखक- राजेन्‍द्र नारायण लाल (‘इस्‍लाम, एक स्‍वयं सिद्ध ईश्‍वरीय जीवन व्‍यवस्‍था)

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आवागमन (तनासुख)

      आर्यों की मान्‍यता है कि दुनिया में जो बन्‍दे गुनाह करते हैं उनकी सजा के लिए हैवानों के शरीर में उन्‍हें जाना पड़ता है׀ मगर किस तरह ? बैठे-बैठे हैवान नहीं बन जाते बल्कि बाकायदा अण्‍डे के अन्‍दर या हैवानों के पेट में शरीर तैयार होता है इसमें गुनाहगार (पापी) आदमी की रूह (आत्‍मा)डाली जाती है अर्थात् दुनिया का इन्तिजाम जिस कदर खुदा ने इंसानों और हैवानों में मिलाप का रखा है यह सब प्रबन्‍ध बन्‍दों के गुनाहों पर निर्भर करता है׀ चुनांचि आर्य धर्म मे एक समर्थक (पण्डित लेखराम) अपने रिसाले (पत्रिका) ‘’सबूत तनासुख’’ में यूं कलमबन्‍द हैं –
      ‘’मसअला आवागमन (तनासुख) की रू से दो किस्‍म के शरीर माने गये हैं एक कर्मयोनि (आमाल खाना), दूसरा भोग योनि (सजा़ख़ाना׀ शरीर में समझने की ताक़त और अच्‍छा बुरा समझने की तमीज़ दी गई है वह कर्म योनि और जिस शरीर में नहीं दी गई है वह भोग योनि है׀ इस लिहाज से इंसान कर्म योनि और बाकी भोग योनि है׀ चूंकि हैवान भोग योनि है वह नेक या बद काम कर नहीं सकते जिस तरह जेल खा़ना के कै़दी सजा़ की अबधि गुज़र जाने के बाद जेल से रिहाई होती है न कि किसी अच्‍छे कर्म से׀ इसी प्रकार सजा़ की अबधि गुजरने के बाद हैवानी शरीर से रिहाई होनी चाहिए और फिर जिस दर्जा शरीर से पतन हुआ या उसी स्थिति में परिवर्तन किया जाता है हैवानी शरीर के पुन्‍य कर्मों से नहीं׀’’ (सबूत तनावसुख पेज 197-198)
      उल्‍लेखनीय है कि तनासुख जिसे हिन्‍दी में पुनर्जन्‍म और आवागम भी कहते हैं यह है कि आत्‍मा छोड़ने इस शरीर के जिसमें वह अब है किसी ऐसे शरीर में चली जाय जो हस्‍बे दस्‍तूर मां के पेट या अण्‍डे के अन्‍दर तैयार हुआ हो, जिसको दूसरो शब्‍दों में तनासुख तवालुद भी कहते हैं यह है आर्यों का दावा׀

      आर्यों का दावा जो हमने उनकी किताब से नकल किया है अपने अर्थ बतलाने में बिल्‍कुल स्‍पष्‍ट है है किसी व्‍याख्‍या और टिप्‍पणी का मुहताज नहीं׀ मजमून स्‍पष्‍ट है कि मनुष्‍य शरीर आत्‍मा के लिए असल है और बाकी हैवानी शरीर बतौर सजा़ पाप के अनुसार मिलते हैं׀ इसी तरह अगर यही आर्यों की मान्‍यता है और निस्‍संदेह यही है तो हमारी तरफ से इस पर संक्षिप्‍त सी द़्रष्टि है׀

1.                  जब मनुष्‍य शरीर भोग योनि (कै़दखाना) नहीं तो फिर प्रश्‍न कि जिससे बजान आकर आप लोगों ने तनासुख तराशा था इसी तरह बहाल रहा׀ इस प्रश्‍न से बचने की गरज से आप लोगों ने पुनर्जन्‍म (पूर्व कर्म) का बदला माना था जिस मनुष्‍य ने जो कुछ पहली योनि में किया वहीं इसको वहां मिलता है और जो कुछ यहां करता है वह किसी दूसरी योनि में मिलेगा लेकिन आर्य मुसाफिर का उक्‍त कथन कहा रहा है कि मनुष्‍य शरीर भोग योनि नहीं जिसको दूसरे शब्‍दों में यूं कहें कि मनुष्‍य शरीर सजा़ के लिए प्रस्‍तावित नहीं हुआ बल्कि आत्‍माओं की असल मंजिल है׀ जब ही तो आपकी मिसाल कै़दी वाली सही होगी तो अब बतलाइये लंगड़ा लंगड़ा क्‍यों हुआ और कोढ़ी कोढ़ी क्‍यों हुआ और अन्‍धा अन्‍धा क्‍यों हुआ׀ अगर घबराकर कहें कि पिछले कर्मों का बदला है तो गलत, जबकि मनुष्‍य योनि भोग योनि नहीं तो इस योनि में पहले जुर्मों की सजा़ कैसी׀ अरबी मिसल (कहावत) निःसंदेह सच है (अर्थ)- ‘’मेंह से भाग कर परनाले के नीचे आ खडा़ हुआ׀’’

2.                  सही बात तो यह है कि जिस मुजरिम को सजा़ देकर उसकी असली हालत की तरफ़ फैरना हो उसको सजा़ का ज्ञान भी होना चाहिए कि यह सजा़ म़ुझको अमुक पाप के बदले में मिली है ताकि भविष्‍य में इस पाप से बचे׀ इसी प्रकार अगर मनुष्‍य शरीर सजा़ के लिए है तो हैवानों (पशुओं) को भी उस जुर्म की ख़बर होनी चाहिए कि अमुक जुर्म की के कारण मुझे सजा़ मिली है ताकि इस सजा़ के पूरी करने के बाद मनुष्‍य शरीर में आकर वैसे जुर्म न करे׀ लेकिन इसकी विपरीत हम देखते हैं कि किसी आर्य को खबर नहीं कि पहले वह किस हैवान (कुत्‍ते, बिल्‍ले, घोड़े, बैल) की योनि में था और किस जुर्म की सजा़ का बदला था׀

3.                  अगर मनुष्‍य दुष्‍कर्म की सजा़ भुगत कर अपनी वास्‍तविक हालत की तरफ ही आता है तो बेचारे अन्‍धे, कोढ़ी, भिक्षु, गरीब, फाके पर फाके उठाने वाले क्‍या हमेशा उसी हालत में रहेंगे और हमेशा से उसी हालत में हैं क्‍योंकि आपके कथनानुसार जिस दर्जा जिस्‍मानी (शरीर के रूप) से पतन हुआ था उसी रूप में इन्‍तका़ल (स्‍थानान्‍तरण) किया जाता है तो क्‍या उन असहायों की आत्‍मा ने कोई शपथ पत्र लिख दिया हुआ है कि हमें यही हालत पसन्‍द है׀

4.                  अगर मनुष्‍य शरीर भोग योनि और जुर्मों के लिए सजा़खाना है तो आप लोगों को मुसलमानों और अन्‍य मांसाहारी कौ़मों का शुक्रगुजा़र होना चाहिए जो जानवरों को जिब्‍ह करके बहुतेरे आर्यों के भाई-बन्‍दों की निजात(मोक्ष)कराते हैं या कराने के सबब हैं׀

5.                  अगर इस मनुष्‍य शरीर में आत्‍मा अपने असली तका़जा़ को पूरा न करेगी तो कौन से शरीर में करेगी, हालांकि हम देखते हैं कि बहुत से लोगों को सांसारिक निषिद्वों के अतिरिक्‍त प्राक्रतिक निषिद्व भी होते हैं׀ उदाहरणस्‍वरूप- आंख से अन्‍धा होना या कान से बहरा होना या किसी ऐसे निर्धन के घर में पैदा होना जहां वह सिवाय पेट पालने के (वह भी भीख मांगने और पाखा़ना उठाने से) कुछ कर ही नहीं सकते׀

6.                  अगर मनुष्‍य का शरीर वास्‍तविक है और जिस शरीर से स्‍थानान्‍तरण होता है उसी शरीर में आत्‍मा आती है तो अवयस्‍क बच्‍चे क्‍या इसी तरह मरते रहेंगे और उनकी आत्‍माऐं हमेशा से इसी तरह छोटी उम्र में बल्कि कुछ मां के पेट में हो शरीर छोड़ती आयी हैं׀ अगर उल्लिखित दर्जा शरीर का अर्थ यह बतलाओ कि अमीरी और गरीबी की दशा से तात्‍पर्य है और तो फिर वही सवाल होगा कि गरीब, बदमाश, भंगड़ जो निर्धनता के कारण समस्‍त बुरे कर्म कर गुजरते हैं यही उनके लिए वास्‍तविक रूप है तो इन बेचारों की कैसी शामत आयी है कि एक तो निर्धनता और असमर्थता के बद कर्म करने पर सांसारिक हाकिम उनको कै़द करें और फिर वहां से ख़लासी (मोक्ष) पाकर भी आयें तो फिर वही नादारी और गरीबी के शरीर में परमेश्‍वर उनको ठूसें׀ फिर इसी तरह हमेशा तक उनकी बुरी गत होती रहे और अगर यह नेक भी हों तो क्‍या फा़यदा जबकि थोडे़ गुनाह पर भी है बाकी़ शरीर में कै़द होना और वहां से छूटकर वास्‍तविक हालत (गरीबी और मुहताजी) में आना है तो क्‍या नतीजा होगा इससे बहतर है कि इस बेचारी आत्‍मा को जो बकौ़ल आपके खुदा की पैदाइश भी नहीं׀ इस चन्‍द रोज़ की जि़न्‍दगी के अहसानों के बदले में (जो इस गरीबी) और मुहताजी की हालत में खुदा ने उन पर किये थे और दर-दर भीख मंगाई थी, उनसे दुगने चौगने बरस कै़द कर लिया जाता और फिर हमेशा के लिए इस कमबख्‍त़ को रिहाई होती और अपनी कमाई से आप गुजा़रा करती और ऐसे खुदा को दूर से सलाम कहती׀ सच पूछो तो खुदा अगर उसे छोड़ दे तो कभी भी खुदा के सामने न आवे और एक ही बार के आजमाने पर उसके बुलाने पर भी दूर से उसको लिख भेजे- (अर्थ)’’आज़माए हुए को आज़माने से निदामत (शर्मिन्‍दगी) हासिल होती है׀’’

7.                  अगर मनुष्‍य शरीर आत्‍माओं के लिए असल है और हैवानी शरीर कै़दखा़ना तो बतलाइये यदि एक हजार या कम से कम सौ साल तक तमाम मख़लूक (जीव) नेक काम करे और कोई ऐसा काम न करे जिससे वह लायके़ सजा़ (सजा़ योग्‍य) हो तो उनकी दीनदारी के यह तो हैवानात (पशुओं) के शरीर में जाने से रहे हों׀ अल्‍बत्‍ता हैवानात अपनी-अपनी कै़द भुगत कर वास्‍तविक हालत (मनुष्‍य शरीर) की तरफ आवेगी जिसकी वजह से हैवानात में एक रोज़ ऐसी कमी होगी कि हमारी सवारी के लिए कोई घोड़ा, दूध के लिए कोई गाय और शहद के लिए कोई मक्‍खी भी न मिलेगी׀ क्‍या फिर इन बेचारे नेकियों का जो कई सालों तक नेकी के कामों में लगे रहे, यही इनाम होना चाहिए था जो आराम उनको बदकारी (दुष्‍कर्म) में था׀ गाड़ी सवारी को, गाय भैंस दूध पीने को, जानवर बोझदारी को वह भी हाथ से जाते रहे, बल्कि बगै़र देखे तो कुल इन्तिजा़म-ए-आलम (सम्‍पूर्ण स्रष्टि के प्रबन्‍धन) में अन्‍तर आ गया׀

8.                  शाब्दिक परिवर्तन से हम यह भी कह सकते हैं कि अगर हैवानी शरीर भोग योनि है तो हम फर्ज़ करते हैं कि तमाम दुनिया में दो सौ साल तक तमाम लोग बदकार गददार (जैसा कि आजकल सामान्‍यत हैं) बलात्‍कारी, शराबी कुल के कुल इसी किस्‍म के हो रहे है׀ जिनमें से कोई भी मनुष्‍य शरीर के योग्‍य न हो तो बताइये तमाम दुनिया का इन्तिजाम कैसे होगा ? जबकि सारे ही जीव (रूह) अपनी बदकारी के कारण हैवानी शरीर में चले गये और एक रोज़ ऐसा आ पहुंचा कि सब के सब हैवानात हो गये और मनुष्‍य एक भी न हो तो नतीजा बुद्विजीवी सोच लें׀

रूपान्‍तरित ः ‘मसअला तनासुख’ (उर्दू)
लेखक- मौलाना अबुल वफा़ सनाउल्‍लाह अमरतसरी (रहमतुल्‍लाह)

शुक्रवार, 11 नवंबर 2011

वे क्‍या कहते हैं- इस्‍लाम के बारे में (What they say about Islam)

     
     यह बडा़ दुर्भाग्‍य है कि बहुत से धर्म इस्‍लाम को और उसकी सम्‍पूर्ण व्‍यवस्‍था को समझने की बजाय उसे अपना वैरी और प्रतिद्वंदी धर्म समझने लगे हैं׀ इसीलिए इस्‍लाम को बदनाम करने, उसके चित्र को खराब करने, उसके कारनामों को आरोपित करने और उसकी व्‍यवस्‍था को आघात पहुंचाने की कोशिशें बराबर होती रहती हैं׀
     इसके बावजूद पहले भी और अब भी यत्र-तत्र बहुत से विद्धान, विचारक, दार्शनिक आपको मिलेंगे, जिन्‍होंने इस्‍लाम को ध्‍यानपूर्वक पढ़ा, जाना-समझा और उसका सही चित्र निखार कर पेश किया, ताकि गलत फ़हमियां दूर हों, संदहे का वातावरण समाप्‍त हो और लोग इस्‍लाम को उसके सही परिप्रेक्ष्‍य में पढ़ और समझ सकें׀
     इसी विचार से हम निम्‍न पंक्तियों में आज के कुछ प्रसिद्ध विद्धानों, विचारकों, और दार्शनिकों के विचार प्रस्‍तुत कर रहे हैं׀ इसमें संदेह नहीं कि सच्‍चाई के लिए किसी वकील की जरूरत नहीं हुआ करती, पर लम्‍बी अबधि से चले आ रहे दुष्‍प्रचारों के कारण इस्‍लाम के चमकते चेहरे को जो मैला बनाने की कोशशें हुई हैं, उसके लिए ज़रूरी है कि सुप्रसिद्ध विद्धानों की राय दे दी जायें, ताकि आम लोगों को सोचने-समझने में आसानी हो׀ हमें उम्‍मीद है कि निम्‍न रायें इस्‍लाम का चित्र निखारने में मदद देंगी-

     ‘’इस्‍लाम अपने अति विशाल युग में भी इतना अनुदार नहीं था, बल्कि सारा संसार उसकी प्रशंसा कर रहा था׀ उस समय जबकि पश्चिमी दुनिया अन्‍धकार में थी, पूर्व क्षितिज में एक उज्‍ज्‍वल सितारा चमका, जिससे विकल संसार को प्रकाश और शांति प्राप्‍त हुई׀ इस्‍लाम झूठा मजहब नहीं है, हिन्‍दुओं को भी इसका उसी तरह अध्‍ययन करना चाहिए, जिस तरह मैंन किया है׀ फिर वे भी मेरे ही समान इससे प्रेम करने लगेंगे׀’’
     ‘’मुझसे किसी ने कहा था कि दक्षिणी अफ्रीका में जो यूरोपियन आबाद हैं, वे इस्‍लाम के प्रचार से कांप रहे हैं, उसी इस्‍लाम से जिसने मौरक्‍को में रोशनी फैलाई और संसार वासियों को भाई-भाई बन जाने का सुख-संवाद सुनाया׀ ऐसा हो सकता है? वे डरते होंगे तो इस बात से कि अगर अफ्रीका के आदिवासियों ने इस्‍लाम कबूल कर लिया तो वे गोरों से बराबर का अधिकार मांगने लगेंगे, अगर वे इस बात से परेशान हैं कि उनका वांशिक बड़प्‍पन कायम न रह सकेगा तो उनका डरना उचित है, क्‍योंकि मैंने देखा कि जूलो ईसाई हो जाता है, तो वह सफेद रंग के ईसाइयों के बराबर नहीं हो पाता, किन्‍तु जैसे ही वह इस्‍लाम ग्रहण करता है बिल्‍कुल उसी वक्‍त़ उसी प्‍याले में पानी पीता है और उसी प्‍लेट में खाना खाता है, जिसमें और कोई पानी पीता और खाना खाता है׀ सही है यूरोपियन का कांपना׀
--- महात्‍मा गांधी
(जगत महर्षि, पेज 2)
     ‘’आप लोगों को यह मालूम हो या न हो लेकिन सत्‍य यह है कि इस्‍लाम और मुहम्‍मद साहब के बारे में मेरे विचार उतने अच्‍छे नहीं थे जैसा कि आज आप पाते हैं׀ मेरा दिल उनकी ओर से द्वेष से भरा हुआ था और मुझे मुहम्‍मद साहब में और उनके इस्‍लाम मे अनोखापन दिखाई देता था׀ लेकिन जब असहयोग आन्‍दोलन में जेल गया और वहां आपकी जीवनी का अध्‍ययन किया तो मेरी आंखें खुल गईं׀ ---
इस्‍लाम की शिक्षाएं अगणित हें, किन्‍तु इनमें विशेष रूप से जो मुझे अत्‍यंत प्रिय है और जो आम आदमी के लिए लाभकारी और व्‍यवहार करने योग्‍य है, बयान करता हूं-
मैं सबसे पहले समता को लेता हूं׀ स्‍वामी हो या दास, धनी हो या निर्धन, गोरा हो या काला, इस्‍लाम ने हर मुसलमान को बराबर का पद दिया है׀ इस्‍लामी शिक्षा में पारिवारिक ऊंच-नीच के लिए कोई जगह नहीं है बल्कि नाम और प्रतिष्‍ठा की कसौटी कर्म और केवल कर्म है׀
विरासत और ज़कात को लीजिए׀ मेरी राय में इस विषय में जो आदेश मिलते हैं, उनसे साफ प्रकट होता है कि इस्‍लाम पूंजीवाद का विरोधी है और धन-विभाजन का समर्थक है׀ ज़कात को इस्‍लामी शिक्षा में जो प्रधानता प्राप्‍त है, वह दूसरे धर्मों में मौजूद नहीं׀ विरासत ने एक परिवार के तमाम लोगों की कठिनाइयां दूर कीं तो ज़कात ने निर्धन मुसलमानों को निर्धनता के गढ़े से उबारा और सुखी जीवन बिताने का अवसर प्रदान किया׀
     सज्‍जनो ! कहा जाता हैकि ‘इस्‍लाम तलवार के बल पर फैला’, आपको सुनकर आश्‍चर्य होगा कि मेरा भी यही विचार था׀ लेकिन वह कौन-सी तलवार थी? क्‍या वह लोहे की तलवार थी? नहीं, वह मुहम्‍मद साहब की अमूल्‍य सच्‍चरित्रता, क्षमा भाव, शुद्ध आचार-विचार, उनके महान गुण और उनकी क़यामत तक न मिटने वाली आदर्श शिक्षाओं की चमकती-दमकती तलवार थी, जिसने गर्दने काटने की जगह दिलों को एक धागे में जोड़ दिया׀’
--- प्रमुख राष्‍ट्रीय नेता बाबू मुकुटधारी प्रसाद
बी.ए.एल.एल.बी.
(जगत महर्षि, पेज 62-68)

          ‘’दुनिया के सारे धर्मों में केवल इस्‍लाम ही एक ऐसा धर्म है जो इस बात की घोषणा कर सकता है कि उसे लोकतंत्र का सच्‍चा संदेश और सच्‍चा संदेशवाहक (पैगम्बर) मिला है׀’
     ‘इस्‍लाम में सबसे अधिक वर्णनीय ये अधिकार हैं जो उसने स्त्रियों को दिये हैं׀ यह सत्‍य है कि जहां तक समाज में स्त्रियों की हैसियत और मर्दों के साथ मेलजोल रखने की स्‍वतंत्रता का सवाल है, दोनों धर्म, इस्‍लाम और ईसाइयत ने स्त्रियों को बहुत कुछ दिया है, लेकिन विरासत, खुला (पत्‍नी की मांग पर पति से तलाक़) जायदार और मिल्कियत के बैध अधिकारों के विषय में इस्‍लाम ने स्त्रियों को ऐसी स्‍वतंत्रता प्रदान की है, जिन्‍हें आज का युग अपनी स्त्रियों को देने का इच्‍छुक है׀’
--- श्री बी.एन.साहनी,
एडीटर, ‘हिन्‍दुस्‍तान टाइम्‍स’ दिल्‍ली,
(मासिक पेशवा, दिल्‍ली, जुलाई 1931 ई0 अंक)
     ‘न्‍याय बोध इस्‍लाम का सबसे ज्‍यादा आश्‍चर्य में डाल देने वाला आदर्श है, इसलिए कि मैंने कुरआन पढ़ा तो मैंने पाया कि इस्‍लाम में जीवन के कुछ तथ्‍यपरक सिद्धांत पूरी दुनिया वालों के लिए हैं, जो काल्‍पनिक नहीं, बल्कि व्‍यवहारिक हैं और पूरे जीवन के लिए दैनिक कार्यक्रम निश्चित करते हैं׀ ये सिद्धांत पूरी दुनिया वालों के लिए हैं, न कि किसी विशेष क्षेत्र और देश के लिए׀’
--- सरोजिनी नायडू
(इस्‍लाम के आदर्श पर दिया गया उनका भाषण)
स्‍पीचेज एण्‍ड राइटिंग्‍ज़ आफ सरोजिनी नायडू,
1918, पेज 167
     ‘मुसलमानों में जातिगत भेदभाव की समाप्ति, यह है इस्‍लाम की बहुत बड़ी देन और आज पूरी दुनिया में जातिगत भेदभाव ने जो हाहाकार मचा रखा है, उसे देखते हुए तो इस्‍लाम के इस सिद्धांत की बड़ी ज़रूरत है׀ इसका जो़रदार प्रचार होना चाहिए׀’
--- ए.जे.टायन बी
सिविलाइजेशन आफ ट्रायल,
न्‍यूयार्क 1948, पेज 205
     ‘क्‍या यह इस्‍लाम का चमत्‍कार नहीं है कि अरब के जाहिल, अक्‍खड़, झगड़ालू, अंधविश्‍वासी, जुआरी, शराबी, डाकू, व्‍यभचारी, वचन भंग करने वाले, कन्‍याओं का बध करने वाले, सौतेली मांओं से विवाह करने वाले लोग, सीधे-सादे, यात्रियों और महमानों का आदर-सत्‍कार करने वाले, मेहनती, ईमानदार, सहायक, वचन का पालन करने वाले, समतावादी और खुदा के भक्‍त हो गये ?

--- लाला काशीराम चावला,
(‘ऐ मुस्लिम भाई’, पेज 254)
     ‘ मैंने हमेशा मुहम्‍मद (सल्‍लल्‍लाहो अलैहि वसल्‍लम) के दीन (इस्‍लाम) को इसकी हैरतअंगेज जीवनी शक्ति के कारण बुलन्‍दी पर पाया है׀ यह एकमात्र धर्म है जो स़ष्टि के परिवर्तित होते दौर में सदा हर उलझन का समाधान प्रस्‍तुत करने की अ‍द्वतीय योग्‍यता रखता है׀ जभी तो यह धर्म हर दौर के मनुष्‍य को प्रभावित करता है׀ मैं यह भी भविष्‍यवाणी करता हूं कि मुहम्‍मद (सल्‍लल्‍लाहो अलैहि वसल्‍लम) का धर्म जिस गति से आजकल यूरोपियन को प्रभावित कर रहा है, उससे भी अधिक गति से यह यूरोप में फैलेगा׀ मध्‍ययुगीन पादरियों ने इस्‍लाम का जो गलत चित्र प्रस्‍तुत किया है, वह या तो अज्ञानता के कारण था या फिर पक्षपाती और हठधर्मी के कारण׀ वास्‍तव में इन बेचारे पादरियों को मुहम्‍मद (सल्‍लल्‍लाहो अलैहि वसल्‍लम) और उनके धर्म से घ्रणा करना ही सिखाया गया था, उनके विचार में मुहम्‍मद (सल्‍लल्‍लाहो अलैहि वसल्‍लम) ईसा (अलैहिस्‍सलाम) के विरोधी थे׀
--- प्रसिद्ध ब्रिटिश दार्शनिक जार्ज बर्नाडशाह
(इन्‍साक्‍लोपेडिया फार सीराह, अफजा़लुर्रहमान)
     ‘मैं एक कदम और आगे बढ़ता हूं और अन्‍त कें यह कहे बिना नहीं रह सकता कि मैंने जहां तक अपने धर्म की किताबें और दूसरे धर्मों के संस्‍थापकों और बड़े-बड़े सुधारकों की शिक्षा का अध्‍ययन किया है, उनमें मुझे कहीं भी समता का इतना प्रबल और स्‍पष्‍ट आदेश नहीं मिला, जितने जो़रदार, साफ़ और बिना उलझे हुए शब्‍दों में हज़रत मुहम्‍मद (सल्‍लल्‍लाहो अलैहि वसल्‍लम) ने उसका आदेश दिया है׀ विभिन्‍न जातियों, वंशों और धर्मों में एक बन्‍धुत्‍व स्‍थापित कर देना हज़रत मुहम्‍मद से पहले दुनिया में संभवतः कभी और कहीं नहीं देख गया׀ यह आप ही की कल्‍याणपूर्ण शिक्षा का प्रभाव है कि वंशीय और जा‍तीय विभेद मिटा कर सबको भाई-भाई बना दिया׀’
--- राजा राधा प्रसाद सिंह
(जगत महर्षि, पेज 30-31)

यूरोप और भारत में इस्‍लाम के प्रवेश का एक मुख्‍य कारण भी है और वह है मानवीय आवश्‍यकता तथा ईश्‍वरीय प्रेरणा. जहां तक यूरोप में इस्‍लाम के प्रवेश तथा ईसाइयों और मुसलमानों के बीच युद्ध का प्रश्‍न है ईसाई उसे सलीबी युद्ध (Crusade) कहते हैं और मुसलमान जिहाद. इस युद्ध का स्‍वरूप कुछ भी हो, गैर मुस्लिम इतिहासकार इस तथ्‍य को स्‍वीकार करते हैं कि यूरोप को बर्बर से सभ्‍य बनाने में इस्‍लाम का बडा़ योगदान है. मुसलामानों ने यूनानी साहित्‍य, दर्शनशास्‍त्र, विज्ञान और गणित की सुरक्षा तथा प्रगति में भी बडा़ योगदान दिया और इनके द्वारा उन्‍होंने यूरोप को प्रकाशित कर दिया तथा उच्‍च शिल्‍प का प्रवेश भी उन्‍हीं के द्वारा हुआ. मुसलमानों ने वहां बड़ी उदारता का प्रदर्शन किया (इस तथ्‍य को यूरोप के अनेक ईसाई विद्वान, इतिहासकार व समजा-शास्‍त्री भी स्‍वीकार करते हैं)
--- श्री राजेन्‍द्र नारायण लाल
(‘इस्‍लाम, एक स्‍वयं सिद्ध ईश्‍वरीय व्‍यवस्‍था’ पेज50)

हज़रत मुहम्‍मद (सल्‍ल0) जिस इस्‍लाम को लेकर आए, वह कोई नया धर्म नहीं है. लेकिन निश्चित रूप से इस्‍लाम समयानुकूल संशोधित सत्‍य धर्म है. इस्‍लाम में  तौहीद (यानी एकेश्‍वरवाद) के प्रति जो आस्‍था और समर्पण है वैसा और कहीं नहीं.
इस्‍लाम में यह भी व्‍यवस्‍था की गई है कि एकेश्‍वरवाद (तौहीद) की या कु़रआन मजीद की आयतों की शुद्धता बनी रहे, ऐसी व्‍यवस्‍था और कहीं नहीं है. मैंने महसूस किया है कि इस्‍लाम पर विश्‍वास लाने वाले के मन में अल्‍लाह (यानी परमेश्‍वर) का जो डर रहता है, वैसा और किसी के मन में नहीं.
 इन्‍हीं विशेषताओं के कारण इस्‍लाम धर्म श्रेष्‍ठ है.

---स्‍वामी लक्ष्‍मीशंकराचार्यलेखक-
’इस्‍लामिक आतंकवाद का  इतिहास'  
(‘इस्‍लाम आतंक या आदर्श’ पेज 86)


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1-  हिन्‍दू कवयित्री लता हया ‘हया’ द्वारा मुशायरों में पेश की गई अपनी लोकप्रिय कविता http://www.youtube.com/watch?v=_XHkoisG6gM  वह है सच्‍चा मजहब जो इस्‍लाम कहाता है.
2 - मुसलमान लोग यह गुमान क्यों करते हैं कि उन्हीं का धर्म सच्चा है? http://anwar-ansari.blogspot.in/2011/10/blog-post_29.html