शुक्रवार, 11 नवंबर 2011

वे क्‍या कहते हैं- इस्‍लाम के बारे में (What they say about Islam)

     
     यह बडा़ दुर्भाग्‍य है कि बहुत से धर्म इस्‍लाम को और उसकी सम्‍पूर्ण व्‍यवस्‍था को समझने की बजाय उसे अपना वैरी और प्रतिद्वंदी धर्म समझने लगे हैं׀ इसीलिए इस्‍लाम को बदनाम करने, उसके चित्र को खराब करने, उसके कारनामों को आरोपित करने और उसकी व्‍यवस्‍था को आघात पहुंचाने की कोशिशें बराबर होती रहती हैं׀
     इसके बावजूद पहले भी और अब भी यत्र-तत्र बहुत से विद्धान, विचारक, दार्शनिक आपको मिलेंगे, जिन्‍होंने इस्‍लाम को ध्‍यानपूर्वक पढ़ा, जाना-समझा और उसका सही चित्र निखार कर पेश किया, ताकि गलत फ़हमियां दूर हों, संदहे का वातावरण समाप्‍त हो और लोग इस्‍लाम को उसके सही परिप्रेक्ष्‍य में पढ़ और समझ सकें׀
     इसी विचार से हम निम्‍न पंक्तियों में आज के कुछ प्रसिद्ध विद्धानों, विचारकों, और दार्शनिकों के विचार प्रस्‍तुत कर रहे हैं׀ इसमें संदेह नहीं कि सच्‍चाई के लिए किसी वकील की जरूरत नहीं हुआ करती, पर लम्‍बी अबधि से चले आ रहे दुष्‍प्रचारों के कारण इस्‍लाम के चमकते चेहरे को जो मैला बनाने की कोशशें हुई हैं, उसके लिए ज़रूरी है कि सुप्रसिद्ध विद्धानों की राय दे दी जायें, ताकि आम लोगों को सोचने-समझने में आसानी हो׀ हमें उम्‍मीद है कि निम्‍न रायें इस्‍लाम का चित्र निखारने में मदद देंगी-

     ‘’इस्‍लाम अपने अति विशाल युग में भी इतना अनुदार नहीं था, बल्कि सारा संसार उसकी प्रशंसा कर रहा था׀ उस समय जबकि पश्चिमी दुनिया अन्‍धकार में थी, पूर्व क्षितिज में एक उज्‍ज्‍वल सितारा चमका, जिससे विकल संसार को प्रकाश और शांति प्राप्‍त हुई׀ इस्‍लाम झूठा मजहब नहीं है, हिन्‍दुओं को भी इसका उसी तरह अध्‍ययन करना चाहिए, जिस तरह मैंन किया है׀ फिर वे भी मेरे ही समान इससे प्रेम करने लगेंगे׀’’
     ‘’मुझसे किसी ने कहा था कि दक्षिणी अफ्रीका में जो यूरोपियन आबाद हैं, वे इस्‍लाम के प्रचार से कांप रहे हैं, उसी इस्‍लाम से जिसने मौरक्‍को में रोशनी फैलाई और संसार वासियों को भाई-भाई बन जाने का सुख-संवाद सुनाया׀ ऐसा हो सकता है? वे डरते होंगे तो इस बात से कि अगर अफ्रीका के आदिवासियों ने इस्‍लाम कबूल कर लिया तो वे गोरों से बराबर का अधिकार मांगने लगेंगे, अगर वे इस बात से परेशान हैं कि उनका वांशिक बड़प्‍पन कायम न रह सकेगा तो उनका डरना उचित है, क्‍योंकि मैंने देखा कि जूलो ईसाई हो जाता है, तो वह सफेद रंग के ईसाइयों के बराबर नहीं हो पाता, किन्‍तु जैसे ही वह इस्‍लाम ग्रहण करता है बिल्‍कुल उसी वक्‍त़ उसी प्‍याले में पानी पीता है और उसी प्‍लेट में खाना खाता है, जिसमें और कोई पानी पीता और खाना खाता है׀ सही है यूरोपियन का कांपना׀
--- महात्‍मा गांधी
(जगत महर्षि, पेज 2)
     ‘’आप लोगों को यह मालूम हो या न हो लेकिन सत्‍य यह है कि इस्‍लाम और मुहम्‍मद साहब के बारे में मेरे विचार उतने अच्‍छे नहीं थे जैसा कि आज आप पाते हैं׀ मेरा दिल उनकी ओर से द्वेष से भरा हुआ था और मुझे मुहम्‍मद साहब में और उनके इस्‍लाम मे अनोखापन दिखाई देता था׀ लेकिन जब असहयोग आन्‍दोलन में जेल गया और वहां आपकी जीवनी का अध्‍ययन किया तो मेरी आंखें खुल गईं׀ ---
इस्‍लाम की शिक्षाएं अगणित हें, किन्‍तु इनमें विशेष रूप से जो मुझे अत्‍यंत प्रिय है और जो आम आदमी के लिए लाभकारी और व्‍यवहार करने योग्‍य है, बयान करता हूं-
मैं सबसे पहले समता को लेता हूं׀ स्‍वामी हो या दास, धनी हो या निर्धन, गोरा हो या काला, इस्‍लाम ने हर मुसलमान को बराबर का पद दिया है׀ इस्‍लामी शिक्षा में पारिवारिक ऊंच-नीच के लिए कोई जगह नहीं है बल्कि नाम और प्रतिष्‍ठा की कसौटी कर्म और केवल कर्म है׀
विरासत और ज़कात को लीजिए׀ मेरी राय में इस विषय में जो आदेश मिलते हैं, उनसे साफ प्रकट होता है कि इस्‍लाम पूंजीवाद का विरोधी है और धन-विभाजन का समर्थक है׀ ज़कात को इस्‍लामी शिक्षा में जो प्रधानता प्राप्‍त है, वह दूसरे धर्मों में मौजूद नहीं׀ विरासत ने एक परिवार के तमाम लोगों की कठिनाइयां दूर कीं तो ज़कात ने निर्धन मुसलमानों को निर्धनता के गढ़े से उबारा और सुखी जीवन बिताने का अवसर प्रदान किया׀
     सज्‍जनो ! कहा जाता हैकि इस्‍लाम तलवार के बल पर फैला, आपको सुनकर आश्‍चर्य होगा कि मेरा भी यही विचार था׀ लेकिन वह कौन-सी तलवार थी? क्‍या वह लोहे की तलवार थी? नहीं, वह मुहम्‍मद साहब की अमूल्‍य सच्‍चरित्रता, क्षमा भाव, शुद्ध आचार-विचार, उनके महान गुण और उनकी क़यामत तक न मिटने वाली आदर्श शिक्षाओं की चमकती-दमकती तलवार थी, जिसने गर्दने काटने की जगह दिलों को एक धागे में जोड़ दिया׀
--- प्रमुख राष्‍ट्रीय नेता बाबू मुकुटधारी प्रसाद
बी.ए.एल.एल.बी.
(जगत महर्षि, पेज 62-68)

          ‘’दुनिया के सारे धर्मों में केवल इस्‍लाम ही एक ऐसा धर्म है जो इस बात की घोषणा कर सकता है कि उसे लोकतंत्र का सच्‍चा संदेश और सच्‍चा संदेशवाहक (पैगम्बर) मिला है׀
     इस्‍लाम में सबसे अधिक वर्णनीय ये अधिकार हैं जो उसने स्त्रियों को दिये हैं׀ यह सत्‍य है कि जहां तक समाज में स्त्रियों की हैसियत और मर्दों के साथ मेलजोल रखने की स्‍वतंत्रता का सवाल है, दोनों धर्म, इस्‍लाम और ईसाइयत ने स्त्रियों को बहुत कुछ दिया है, लेकिन विरासत, खुला (पत्‍नी की मांग पर पति से तलाक़) जायदार और मिल्कियत के बैध अधिकारों के विषय में इस्‍लाम ने स्त्रियों को ऐसी स्‍वतंत्रता प्रदान की है, जिन्‍हें आज का युग अपनी स्त्रियों को देने का इच्‍छुक है׀
--- श्री बी.एन.साहनी,
एडीटर, हिन्‍दुस्‍तान टाइम्‍स दिल्‍ली,
(मासिक पेशवा, दिल्‍ली, जुलाई 1931 ई0 अंक)
     न्‍याय बोध इस्‍लाम का सबसे ज्‍यादा आश्‍चर्य में डाल देने वाला आदर्श है, इसलिए कि मैंने कुरआन पढ़ा तो मैंने पाया कि इस्‍लाम में जीवन के कुछ तथ्‍यपरक सिद्धांत पूरी दुनिया वालों के लिए हैं, जो काल्‍पनिक नहीं, बल्कि व्‍यवहारिक हैं और पूरे जीवन के लिए दैनिक कार्यक्रम निश्चित करते हैं׀ ये सिद्धांत पूरी दुनिया वालों के लिए हैं, न कि किसी विशेष क्षेत्र और देश के लिए׀
--- सरोजिनी नायडू
(इस्‍लाम के आदर्श पर दिया गया उनका भाषण)
स्‍पीचेज एण्‍ड राइटिंग्‍ज़ आफ सरोजिनी नायडू,
1918, पेज 167
     मुसलमानों में जातिगत भेदभाव की समाप्ति, यह है इस्‍लाम की बहुत बड़ी देन और आज पूरी दुनिया में जातिगत भेदभाव ने जो हाहाकार मचा रखा है, उसे देखते हुए तो इस्‍लाम के इस सिद्धांत की बड़ी ज़रूरत है׀ इसका जो़रदार प्रचार होना चाहिए׀
--- ए.जे.टायन बी
सिविलाइजेशन आफ ट्रायल,
न्‍यूयार्क 1948, पेज 205
     क्‍या यह इस्‍लाम का चमत्‍कार नहीं है कि अरब के जाहिल, अक्‍खड़, झगड़ालू, अंधविश्‍वासी, जुआरी, शराबी, डाकू, व्‍यभचारी, वचन भंग करने वाले, कन्‍याओं का बध करने वाले, सौतेली मांओं से विवाह करने वाले लोग, सीधे-सादे, यात्रियों और महमानों का आदर-सत्‍कार करने वाले, मेहनती, ईमानदार, सहायक, वचन का पालन करने वाले, समतावादी और खुदा के भक्‍त हो गये ?

--- लाला काशीराम चावला,
(ऐ मुस्लिम भाई, पेज 254)
     मैंने हमेशा मुहम्‍मद (सल्‍लल्‍लाहो अलैहि वसल्‍लम) के दीन (इस्‍लाम) को इसकी हैरतअंगेज जीवनी शक्ति के कारण बुलन्‍दी पर पाया है׀ यह एकमात्र धर्म है जो स़ष्टि के परिवर्तित होते दौर में सदा हर उलझन का समाधान प्रस्‍तुत करने की अ‍द्वतीय योग्‍यता रखता है׀ जभी तो यह धर्म हर दौर के मनुष्‍य को प्रभावित करता है׀ मैं यह भी भविष्‍यवाणी करता हूं कि मुहम्‍मद (सल्‍लल्‍लाहो अलैहि वसल्‍लम) का धर्म जिस गति से आजकल यूरोपियन को प्रभावित कर रहा है, उससे भी अधिक गति से यह यूरोप में फैलेगा׀ मध्‍ययुगीन पादरियों ने इस्‍लाम का जो गलत चित्र प्रस्‍तुत किया है, वह या तो अज्ञानता के कारण था या फिर पक्षपाती और हठधर्मी के कारण׀ वास्‍तव में इन बेचारे पादरियों को मुहम्‍मद (सल्‍लल्‍लाहो अलैहि वसल्‍लम) और उनके धर्म से घ्रणा करना ही सिखाया गया था, उनके विचार में मुहम्‍मद (सल्‍लल्‍लाहो अलैहि वसल्‍लम) ईसा (अलैहिस्‍सलाम) के विरोधी थे׀
--- प्रसिद्ध ब्रिटिश दार्शनिक जार्ज बर्नाडशाह
(इन्‍साक्‍लोपेडिया फार सीराह, अफजा़लुर्रहमान)
     मैं एक कदम और आगे बढ़ता हूं और अन्‍त कें यह कहे बिना नहीं रह सकता कि मैंने जहां तक अपने धर्म की किताबें और दूसरे धर्मों के संस्‍थापकों और बड़े-बड़े सुधारकों की शिक्षा का अध्‍ययन किया है, उनमें मुझे कहीं भी समता का इतना प्रबल और स्‍पष्‍ट आदेश नहीं मिला, जितने जो़रदार, साफ़ और बिना उलझे हुए शब्‍दों में हज़रत मुहम्‍मद (सल्‍लल्‍लाहो अलैहि वसल्‍लम) ने उसका आदेश दिया है׀ विभिन्‍न जातियों, वंशों और धर्मों में एक बन्‍धुत्‍व स्‍थापित कर देना हज़रत मुहम्‍मद से पहले दुनिया में संभवतः कभी और कहीं नहीं देख गया׀ यह आप ही की कल्‍याणपूर्ण शिक्षा का प्रभाव है कि वंशीय और जा‍तीय विभेद मिटा कर सबको भाई-भाई बना दिया׀
--- राजा राधा प्रसाद सिंह
(जगत महर्षि, पेज 30-31)

यूरोप और भारत में इस्‍लाम के प्रवेश का एक मुख्‍य कारण भी है और वह है मानवीय आवश्‍यकता तथा ईश्‍वरीय प्रेरणा. जहां तक यूरोप में इस्‍लाम के प्रवेश तथा ईसाइयों और मुसलमानों के बीच युद्ध का प्रश्‍न है ईसाई उसे सलीबी युद्ध (Crusade) कहते हैं और मुसलमान जिहाद. इस युद्ध का स्‍वरूप कुछ भी हो, गैर मुस्लिम इतिहासकार इस तथ्‍य को स्‍वीकार करते हैं कि यूरोप को बर्बर से सभ्‍य बनाने में इस्‍लाम का बडा़ योगदान है. मुसलामानों ने यूनानी साहित्‍य, दर्शनशास्‍त्र, विज्ञान और गणित की सुरक्षा तथा प्रगति में भी बडा़ योगदान दिया और इनके द्वारा उन्‍होंने यूरोप को प्रकाशित कर दिया तथा उच्‍च शिल्‍प का प्रवेश भी उन्‍हीं के द्वारा हुआ. मुसलमानों ने वहां बड़ी उदारता का प्रदर्शन किया (इस तथ्‍य को यूरोप के अनेक ईसाई विद्वान, इतिहासकार व समजा-शास्‍त्री भी स्‍वीकार करते हैं)
--- श्री राजेन्‍द्र नारायण लाल
(इस्‍लाम, एक स्‍वयं सिद्ध ईश्‍वरीय व्‍यवस्‍था पेज50)

हज़रत मुहम्‍मद (सल्‍ल0) जिस इस्‍लाम को लेकर आए, वह कोई नया धर्म नहीं है. लेकिन निश्चित रूप से इस्‍लाम समयानुकूल संशोधित सत्‍य धर्म है. इस्‍लाम में  तौहीद (यानी एकेश्‍वरवाद) के प्रति जो आस्‍था और समर्पण है वैसा और कहीं नहीं.
इस्‍लाम में यह भी व्‍यवस्‍था की गई है कि एकेश्‍वरवाद (तौहीद) की या कु़रआन मजीद की आयतों की शुद्धता बनी रहे, ऐसी व्‍यवस्‍था और कहीं नहीं है. मैंने महसूस किया है कि इस्‍लाम पर विश्‍वास लाने वाले के मन में अल्‍लाह (यानी परमेश्‍वर) का जो डर रहता है, वैसा और किसी के मन में नहीं.
 इन्‍हीं विशेषताओं के कारण इस्‍लाम धर्म श्रेष्‍ठ है.

---स्‍वामी लक्ष्‍मीशंकराचार्यलेखक-
इस्‍लामिक आतंकवाद का  इतिहास'  
(इस्‍लाम आतंक या आदर्श पेज 86)


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1-  हिन्‍दू कवयित्री लता हया हया द्वारा मुशायरों में पेश की गई अपनी लोकप्रिय कविता http://www.youtube.com/watch?v=_XHkoisG6gM  वह है सच्‍चा मजहब जो इस्‍लाम कहाता है.
2 - मुसलमान लोग यह गुमान क्यों करते हैं कि उन्हीं का धर्म सच्चा है? http://anwar-ansari.blogspot.in/2011/10/blog-post_29.html   

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